श्रीराम नवमी पर विशेष: ऐसे थे रामराज्य के राजा राम के सद्गुण

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ऐसे थे रामराज्य के राजा राम के सद्गुण
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भगवान श्रीराम के सद्गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं कि श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान, अदोषदर्शी, सहिष्णु, दीन-दुखियों को सात्वना प्रदान करने वाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, सदा कल्याणकारी, सभी प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलने वाले और सत्यवादी हैं।

भगवान श्रीराम किसी के दोष नहीं देखते थे। वे सदा शांतिप्रिय रहते और सांत्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे। यदि उनसे कोई कठोर बात भी कह देता तो वे उसका प्रत्युत्तर नहीं देते थे। कभी कोई उन पर एक बार भी उपकार कर देता तो वे उसके उस एक ही उपकार से सदा संतुष्ट रहते।

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श्रीराम का जीवन अनुकरणीय है। श्रीराम किसी के सैकड़ों अपराध करने पर भी उसके अपराधों को याद नहीं रखते थे। वे सदा चरित्र व ज्ञान में उत्तम तथा अवस्था में बढ़े सत्पुरूषों के साथ ही बातचीत करते। उनके साथ विनय से पेश आते। वे अपने पास आए हुए मनुष्यों से अपनी ओर से बातचीत शुरू करते। ऐसी बातें बोलते जो उन्हें प्रिय लगें। महान बल और पराक्रम से संपन्न होने पर भी उन्हें उनका गर्व नहीं होता था।

श्रीराम के मुख से कभी दुवचन और झुठी बात तो निकलती ही नहीं थी। वे विद्वान थे और सदा वृद्व पुरूषों का सम्मान किया करते थे। अमंगलकारी निषिद्व कर्मों में उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी। शास्त्रविरूद्व बातों को सुनने में उनकी तनिक भी रुचि नहीं थी।

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श्रीराम अपने न्याययुक्त पक्ष के समर्थन में देवगुरू बृहस्पति के समान एक से बढ़कर एक दृष्टांत देते थे। धर्म के दाता गुरूजनों से उन्हें उत्तम शिक्षा प्राप्त हुई। वे बड़े बृद्विमान, स्मरणशक्ति से संपन्न और प्रतिभाशाली थे। गुरूजनों के प्रति उनकी दृढ़ भक्ति थी। वे लोक-व्यवहार के संपादन में समर्थ और समयोचित धर्माचरण में कुशल थे।

श्रीराम विनयशील अपने अभिप्राय को छिपानेवाले, मंत्र को गुप्त रखने वाले और उत्तम सहायकों से संपन्न थे। वस्तुओं के त्याग और संग्रह को वे भलीभांति जानते थे। वे आलस्यरहित, प्रमादशुन्य तथा अपने पराए मनुष्यां के दोषों को भलीभांति प्रकट कर जानने वाले थे।

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श्रीराम शास्त्रों के ज्ञाता, उपकारियों के प्रति कृतज्ञ तथा दूसरों के मनोभावों को जानने में कुशल थे। दम्भ और ईर्ष्या का उनमें सदा अभाव था। किसी की वाणी का उनके मन में अवहेलना का भाव नहीं था। उन्हें सत्पुरूषों का संग्रह और पालन तथा दुष्ट पुरूषों का दंड देने के अवसरों का ठीक-ठाक ज्ञान था।

वाल्मीकि महाराज कहते हैं कि श्रीराम को आय के स़्त्रोत का अच्छी तरह ज्ञान था। जिस प्रकार फुलों को नष्ट किए बिना भंवरा उनसे रस लेता है। इसी भाति वे प्रजा को कष्ट दिए बिना उनसे न्यायोचित धन का उपार्जन करने में कुशल थे। शास्त्रवर्णित व्यय-कर्म का भी उन्हें ठीक-ठाक ज्ञान था।

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अपने सद्गुणां के कारण प्रजा उन्हें प्राणों की भांति प्रिय थी। मन और इंद्रियों के संयम आदि सद्गुण श्रीराम में वैसी ही शोभा पाते थे, जैसे तेजस्वी सूर्य अपनी किरणों से सुशोभित होते हैं।

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