दंगल गर्ल गीता फौगाट को हरा भारत केसरी बनी दिव्या सैन, अब कॉमनवैल्थ खेलने जाएंगी ऑस्ट्रेलिया

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दंगल गर्ल गीता फौगाट को हरा भारत केसरी बनी दिव्या सैन
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नई दिल्लीः दिल में कुछ करने का हौंसला हो तो राह में बाधाएं कब तक टिक पाती है। कुछ ऐसा ही कमाल कर दिखाया है राजस्थान के भरतपूर जिले की रहने वाली दिव्या सैन ने। परिवार की माली हालात ठीक नहीं होने पर भी कुश्ती में कुछ कर दिखाने का उसके जूनून ने आखिरकार उसे मंजिल तक पहुंचा दिया। दिव्या ने भिवानी में आयोजित 2 करोड़ की कुश्ती में 68 किलोग्राम भार वर्ग में दगल गर्ल गीता फोगाट को चित्त कर भारत केसरी का खिताब जीत लिया। दिव्या अब कॉमनवैल्थ गेम में भाग लेने के लिए 4 अप्रैल को आस्ट्रे्लिया जाएंगी।

19 वर्षीया दिव्या की संघर्ष की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। गरीबी इतनी की कि जब भिवानी में दिव्या एक के बाद एक महिला पहलवानों को पटखनी देकर फाइनल की ओर बढ़ रही थी। उसके पिता सूरज सैन उसी स्टेडियम के बाहर फड़ लगाकर टैकसूट, लंगोट व जांगिया बेच रहे थे। दिव्या सैन का सेमीफाइनल में सामना दंगल गर्ल गीता फोगाट से हुआ। अपने मजबूत हौंसलों के साथ खड़ी दिव्या के सामने गीता फोगाट के सारे दावं फेल होते नजर आएं। जबकि दिव्या पिछले दिनों भयंकर बुखार से ग्रसित थी। लेकिन रिंग में उतरने के बाद दिव्या ने किसी को इस बात का जरा भी अहसास नहीं होने दिया कि वह बीमारी से उभरकर आई है। दिव्या सैन ने गीता फोगाट को चित्त करने में मात्र 1.8 मिनट का समय लगाया।

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भारत की नई सनसनी बनी दिव्या सैन का फाइनल मुकाबला रेलवे की रितु मलिक से हुआ। इस फाइनल कुश्ती को देखने के लिए स्टेडियम पूरी तरह खचाखच भरा हुआ था। 68 किलोग्राम भारवर्ग की इस फाइनल कुश्ती को देखने के लिए दर्शक खासे रोमांचित नजर आ रहे थे। फाइनल में दोनों पहलवान हार मानने को तैयार नहीं दिखाई दे रही थी। एक-दूसरे को पटखनी देने की पूरजोर कोशिश कर रही थी। कभी रितु का पलड़ा भारी दिखाई देता तो कभी दिव्या के दावं के आगे रितु कमजोर नजर आती। छह मिनट के इस मुकाबले में आखिरकार दिव्या ने जीत हासिल कर ली। जैसे ही इस छोटी पहलवान के जीत की घोषणा हुई सारा स्टेडियम तालियों की गडगड़ाट से गूंज उठा।

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राजस्थान के भरतपूर की मूल निवासी दिव्या सैन ने भरतपूर से कुश्ती खेलना प्रारंभ किया। उसकी मां संयोगिता लंगोट, टैकसूट व जांगिया सिलती है तो उसके पिता सूरज सैन इन्हें अखाड़ा के बाहर बेचते हैं। यही इनके परिवार की रोजी-रोटी का जरिया है। इसी से इनका परिवार का पालन पोषण होता है। जब नन्ही दिव्या ने अपनी मां को पहलवानों के लिए लंगोट व जांगिया सिलते और पिता को बेचते देखा। तो उसके मन में भी आया वह भी कुश्ती करेगी और अपने मां-बाप का नाम रोशन करेगी।

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चने खाकर की दिव्या ने डाइट की पूर्ति

दंबग गर्ल के नाम से जाने जानी वाली दिव्या सैन के पिता सूरज बताते हैं कि पहलवानों की डाइट पर लाखों रुपए खर्च होते हैं। गरीबी के कारण वह अपनी बेटी की डाइट पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते हैं। वे चाहकर उसके लिए वो सब नहीं कर पाते जो एक रेसलर के लिए जरूरी होता है। जहां दूसरे पहलवान दूध और बादाम खाकर अपनी बॉडी बनाते हैं, वहीं उनकी बेटी चने खाकर अपनी डाइट की पूर्ति किया करती है।

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सपने से कम नहीं भारत केसरी का खिताब

भिवानी में 68 किलोग्राम भार वर्ग में सभी को चित्त कर जीतने वाली दिव्या सैन व उसके परिवार के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा है। दिव्या की मां संयोगिता व पिता सूरज की आंखों से आंसू बरबस ही छलक पड़ते हैं जब वो अपनी बेटी की कामयाबी की कहानी बताते हैं। उनका कहना है कि उनकी बेटी ने वो कर दिया जो बड़े-बड़े नहीं कर पाते।

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इनाम की राशि से उतारेगी कर्ज

भिवानी में आयोजित भारत केसरी दंगल प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली दिव्या ने बताया कि उसे इस प्रतियोगिता में 10 लाख की ईनामी राशि मिली है। इस ईनाम की राशि से सबसे पहले अपने पिता का कर्ज उतारेगी। उसके पिता सूरज पर 8 लाख का कर्ज है। सूरज ने बताया कि महंगाई के इस जमाने में परिवार को दो जून की रोटी मुहैया कराना बड़ा कठिन कार्य है। ऐसे में उसे भरतपूर छोड़कर रोजगार की तलाश में दिल्ली आना पड़ा। यहां भी वे किराये के मकान में रहकर बेमुश्किल अपने परिवार का खर्चा चला पा रहे हैं। इसी कारण कभी कुछ लोगों से उधार भी लेना पड़ा।

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