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Jagannath Rath Yatra ALwar: यहां हर साल होता है भगवान जगन्नाथ का विवाह

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Jagannath Rath yatra Alwar

भारत देश विभिन्न परम्पराओं वाला देश है। कुछ परंपराएं तो ऐसी है जो सदियों से चली आ रही है। ऐसी ही एक परम्परा हमें राजस्थान के अलवर जिले में देखने को मिलती है। जहां सैकड़ों सालों से भगवान जगन्नाथ दूल्हा बनकर जानकी को ब्याहने निकलते हैं। इस विवाह महोत्सव का साक्षी बनता है सारा शहर।

अलवर शहर के सुभाष चौक स्थित जगन्नाथ मंदिर करीब 270 साल पुराना है। करीब डेढ़ साल से यहां भगवान जगन्नाथ और माता जानकी के विवाह की रस्म निभाई जा रही है।

जगन्नाथ मंदिर की बात करें तो हिन्दू स्थापत्य शैली से बना यह मंदिर पूर्वमुखी है। मंदिर के गर्भगृह में जगन्नाथ महाराज की दो श्यामवर्णीय विग्रह प्रतिष्ठित है। इनमें एक प्रतिमा चंदन काष्ठ की चल तथा दूसरी प्रतिमा ठोस धातु की अचल है, जिन्हें बूढ़े जगन्नाथजी के नाम से जाना जाता है।

जन-जन की आस्था के केंद्र भगवान जगन्नाथ का यह विवाह महोत्सव जिसे भगवान जगन्नाथ का मेला भी कहा जाता है। पूरे 15 दिन तक चलता है। इसकी खास बात यह है कि इस विवाह महोत्सव में वे सारी रस्में निभाई जाती है, जो एक हिन्दू विवाह में निभाई जाती है। गणेश पूजन के साथ शुरू होने वाले इस विवाह महोत्सव में लग्न, हल्दी, हरदात, बारात, जनवास, फेरे आदि सभी रस्मों का निर्वहन किया जाता हैं।

देश की राजधानी से 150 किलोमीटर दूर अलवर में यह विवाह महोत्सव आषाढ़ माह में आयोजित किया जाता है। आषाढ़ शुल्क देवशयनी एकादशी पर होने वाले इस विवाह महोत्सव की तैयारी काफी दिनों पहले ही प्रारंभ हो जाती है। शहर के 6 किलोमीटर की दूर रूपबास को विवाह स्थल बनाया जाता हैं।

आषाढ़ नवमी को जब भगवान जगन्नाथ सज-धज कर दूल्हा बनके इंद्रविमान पर आरूढ़ होकर निकलते हैं तो समूचा वातावरण जय जय जगन्नाथ के जयघोष से गूंज उठता है। दूल्हा बने भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती हैं। आंखों में अपने आराध्य की एक झलक पाने को आतुर भक्तों का जोश व उत्साह तथा भक्ति भावना देखते ही बनती है। इसे भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से एक दिन पूर्व सालिग्राम की सवारी मेला स्थल रूपबास पहुंचती है। ऐसा माना जाता है। सालिग्राम तैयारियों का जायजा और भगवान की अगवानी के लिए एक दिन पहले ही रूपबास पधारते हैं। विवाह महोत्सव वाले दिन सुबह जानकी माता की सवारी रूपबास पहुंचती है। इसी दिन रात्रि को मंत्रोच्चारण के बीच भगवान जगन्नाथ और माता जानकी का वरमाला महोत्सव व विवाह की अन्य रस्में होती है।

अनूठी है इंद्र विमान की सजावट

इंद्र विमान की सुंदरता देखते ही बनती है। इसे रंग-बिरंगे कपड़ो और झालरों से सजाया जाता है। बहलीनुमा यह रथ दो मंजिला है, जिसमें नीचे रथवान और प्रमुख लोगें के बैठने की व्यवस्था है तथा उपरी मंजिल पर जाने के लिए सीढ़िया बनी है। रथयात्रा के दौरान इसी मंजिल पर भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा विराजित की जाती है। छत पर तीन गुंबदनुमा है। जिसें चटक रंग के कपड़ों, झालरों व फानूस आदि से सजाया जाता है। चार बड़े पहियों वाला यह रथ 15 फुट चौड़ा और 25 फुट लंबा है।

महाराज ने भेंट किया था इंद्रविमान

जगन्नाथ महाराज जिस रथ पर सवार होकर निकलते हैं वह तिजारा के महाराज बलवंतसिंह का रथ है। ऐसा बताया जाता है कि 1826 से 1845 तक महाराजा ने इसे राजकीय कार्य में उपयोग किया। बाद में तिजारा राज्य का अलवर मे विलय होने के बाद यह रथ अलवर आ गया। उस समय तक भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा अपेक्षाकृत छोटे रथ में निकलती थी। महाराज ने यह देखा तो महसूस किया कि भगवान की सवारी उनसे छोटे रथ में कैसे निकल सकती हैं और उन्होंने तत्काल अपना इंद्रविमान मंदिर कमेटी को रथयात्रा के लिए सौंप दिया। पहले इंद्रविमान को चार हाथी खींचा करते थे।

साल में पांच दिन दर्शन देते हैं बूढ़े जगन्नाथजी

अलवर शहर के पुराना कटला स्थित प्रसिद्व जगन्नाथ मंदिर में विराजमान भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा के पीछे प्राण प्रतिष्ठित है बुढ़े जगन्नाथजी, जो कि साल में केवल पांच दिन श्रद्वालुओं को दर्शन देते हैं।
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा रूपबास रवाना होने के साथ ही उनके पीछे रखी अचल प्रतिमा के दर्शन प्रारंभ हो जाते हैं, जिन्हें बूढ़े जगन्नाथजी के नाम से जाना जात है।

बूढ़े जगन्नाथजी की अचल प्रतिमा के दर्शन खोलते ही भक्तों की भीड़ दर्शन के लिए उमड़ पड़ती है। जब भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा रूपवास से वापस सुभाष चौक स्थित मंदिर आ जाती है। तो उसी दिन बूढ़े जगन्नाथजी के दर्शन एक वर्ष के फिर एक बार बंद हो जाते है।

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