आखिर Puja के बाद क्यों की जाती है Aarti ? जानिए इसके पीछे का कारण..!!!

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why must the aarti after worship

आखिर Puja के बाद क्यों की जाती है Aarti ? जानिए इसके पीछे का कारण..!!!

पूजा के अंत में हम सभी भगवान की आरती करते हैं। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता हैं इन सबका विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। किसी भी देवता की आरती करते समय उन्हें 3 बार पुष्प अर्पित करें। इतना ही नहीं आरती के दौरान ढोल, नगाड़े, घड़ियाल आदि भी बजाना चाहिए। why must the aarti after worship?

5 प्रकार से होती है आरती

पहली आरती दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम या पीपल आदि की पत्तों से और पांचवी साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग, मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव से।

पंच प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए। जैसे की मानो वह पंच प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति की प्रतीक मानी जाती है। जब हम अंतमर्न से ईश्वर को पुकारते है, तो यह पंचारती कहलाती है।

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सामग्री का महत्व

आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामगियां भी डालते है। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक कारण भी है।

कलश

कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं। यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं तो इसका अर्थ यह है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किवंदति है कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं को वास माना जाता है।

जल

जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल हम जल को शुद्व तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।

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नारियल

आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते है। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक उर्जा का भंडारा पाया जाता है। हम जब आरती गाते हैं तो नारियल की शिखाओं में मौजूद उर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगे काफी सूक्ष्म होती है।

सोना

ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक उर्जा फैलाता है। सोने को शुद्व कहा जाता हैं यही वजह है कि इसे भक्तों को भगवान से जोड़ने का माध्यम भी माना जाता है।

तांबे का पैसा

तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती है। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना गया है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।

सप्त नदियों का जल

गंगा, गोदावरी, यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरी और नर्मदा नदी का जल पूजा के लिए कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक उर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है।

बता दें कि ज्यादातर योगी-मुनि और तस्पसियों ने ईश्वर से एकाकार होने के लिए इन नदियों के किनारें तपस्या की थी।

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सुपारी और पान

सुपारी को यदि हम जल में डालते हैं तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देते हैं और हमारे भीतर देवताओं के अछे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है। पान की बेल को नाबेल भी कहते है।

नागबेल को भूलोक और ब्रह्म लोक को जोड़ने वाली कड़ी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही इसे सात्विक भी कहा जाता है। देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक उर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।

तुलसी

पूजा में तुलसी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्व करने की क्षमता अधिक होती है।

एक शुभ पात्र में शुद्व घी लें और उसमें विषम संख्या जैसे 3, 5 या 7 बत्तियां जलाकर आरती करें। आप चाहें तो कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है। जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं।

आखिर Puja के बाद क्यों की जाती है Aarti ? जानिए इसके पीछे का कारण..!!!

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