7000 फीट की ऊंचाई, चारों तरफ दुश्मन और हाथ में सिर्फ पिस्तौल… ईरान में अमेरिकी वायुसैनिक ने कैसे बिताए 48 घंटे

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जब अमेरिकी फाइटर जेट F-15E Strike Eagle क्रैश हुआ, तो एयरमैन ने खुद को खतरनाक स्थिति में फंसा हुआ पाया। वह दुश्मन देश ईरान की जमीन पर घायल अवस्था में अकेला था। पायलट को तो तलाशी अभियान के बाद बचा लिया गया, लेकिन हथियार सिस्टम अधिकारी (WSO) लापता हो गया। दूसरी तरफ, ईरान ने उसे पकड़वाने के लिए इनाम तक घोषित कर दिया, जिससे हालात और भी तनावपूर्ण हो गए। यह मिशन धीरे-धीरे एक हाई-वोल्टेज थ्रिलर फिल्म जैसा बन गया।

पहाड़ों में छिपकर बचाई जान

यह एयरमैन करीब 48 घंटे तक दुश्मन इलाके में छिपकर अपनी जान बचाता रहा। कभी वह पहाड़ों की दरारों में छिपा, तो कभी 7,000 फीट ऊंची पहाड़ी चढ़कर अपने पीछा करने वालों से दूर रहा। उसके पास एक हैंडगन, कम्युनिकेशन डिवाइस और ट्रैकिंग बीकन था। लेकिन फिर भी उसकी लोकेशन 24 घंटे तक अमेरिकी सेना को भी नहीं पता चल पाई। हालात इतने खतरनाक थे कि हर कदम पर पकड़े जाने का डर था, लेकिन उसने हिम्मत और समझदारी से खुद को बचाए रखा।

ईरान में एयरमैन तक कैसे पहुंची US फोर्स

आखिरकार CIA ने अपनी खास तकनीक से उसकी लोकेशन ट्रैक की और जानकारी Pentagon व सेना के साथ शेयर की। इसके बाद, स्पेशल फोर्स की टीम को गुपचुप तरीके से इलाके में उतारा गया। शनिवार रात को शुरू हुआ यह ऑपरेशन बेहद जोखिम भरा था, लेकिन आखिरकार अधिकारी को सुरक्षित निकाल लिया गया। इस मिशन को डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी इतिहास के सबसे साहसी रेस्क्यू ऑपरेशनों में से एक बताया।

SERE ट्रेनिंग ने बचाई जान

अधिकारियों के मुताबिक, इस एयरमैन ने अपनी खास ट्रेनिंग का पूरा इस्तेमाल किया। इसे SERE Training कहा जाता है, जिसमें सैनिकों को सिखाया जाता है कि दुश्मन इलाके में कैसे जिंदा रहना है, कैसे बचकर निकलना है और कैसे सही समय पर मदद तक पहुंचना है। इस ट्रेनिंग में मानसिक मजबूती, त्वरित फैसले और परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालने की कला सिखाई जाती है। यही वजह रही कि वह इतने मुश्किल हालात में भी खुद को सुरक्षित रख सका।

ईरान कर रहा मिशन फेल होने का दावा

एक तरह अमेरिका है, जो इस ऑपरेशन को बड़ी सफलता बता रहा है। वहीं ईरान ने इसे पूरी तरह नाकाम बताया है। सैन्य अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने इस मिशन को विफल कर दिया और अमेरिकी दावों को गलत बताया। हालांकि, जमीन पर क्या सच हुआ, यह पूरी तरह साफ नहीं है। लेकिन एक बात तय है – यह घटना दिखाती है कि आधुनिक युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं बल्कि ट्रेनिंग, टेक्नोलॉजी और हिम्मत से भी जीता जाता है।

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