Hiroshima Day 2026: जापान के हिरोशिमा में 6 अगस्त 1945 को हुए विनाशकारी परमाणु हमले को आज 81 साल पूरे हो गए हैं। 6 अगस्त 1945 का दिन इतिहास के सबसे खौफनाक पन्नों में दर्ज है, जब अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर परमाणु बम गिराकर एक ही झटके में पूरी सभ्यता को हिलाकर रख दिया था। आज, इस त्रासदी की 81वीं बरसी पर हिरोशिमा के ‘पीस मेमोरियल पार्क’ में एक भावुक और विशाल शांति समारोह का आयोजन किया गया।
समारोह में ठीक सुबह 8:15 बजे—जिस वक्त अमेरिकी बी-29 बॉम्बर से बम गिराया गया था—शांति की घंटी बजाकर एक मिनट का मौन रखा गया और मारे गए निर्दोष लोगों को श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम में अमेरिका और ईरान सहित करीब 120 देशों के प्रतिनिधियों और 50,000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया।
Hiroshima Day 2026: मेयर की दुनिया को सख्त चेतावनी
हिरोशिमा के मेयर काज़ुमी मात्सुई ने अपने ‘शांति घोषणापत्र’ में विश्व शक्तियों और वैश्विक नेताओं की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि आज भी कई देश परमाणु हथियारों को रक्षा और नियंत्रण (Deterrence) का जरिया मानकर हिंसा को सही ठहरा रहे हैं।
मात्सुई ने चेतावनी देते हुए कहा, “ताकत के दम पर अपनी समृद्धि हासिल करने की कोशिश और परमाणु हथियारों की अमानवीयता को नजरअंदाज करना दुनिया को एक बार फिर से विनाशकारी हिंसा के दुचक्र में धकेल सकता है। इससे हिरोशिमा और नागासाकी जैसी एक और त्रासदी का खतरा पैदा हो रहा है।”
जापानी राजनीति और परमाणु नीति पर बढ़ता तनाव
समारोह में जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने भी पहली बार बतौर पीएम शिरकत की। ताकाइची ने कहा कि वे परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया के लिए यथार्थवादी रुख अपनाएंगी। हालांकि, उनके इस रुख से परमाणु हमले में बचे हुए लोग (Survivors) और नागरिक चिंतित हैं।
जापान लंबे समय से अपनी “तीन गैर-परमाणु सिद्धांतों” (परमाणु हथियार न बनाना, न रखना और देश में न आने देना) का पालन करता रहा है। लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए सरकार द्वारा इन सिद्धांतों में ढील देने की चर्चाओं से परमाणु हमलों के बचे हुए पीड़ितों (हिबाकुशा) में भारी निराशा है।
1,40,000 मौतों का वह काला इतिहास
6 अगस्त 1945 को अमेरिकी सेना द्वारा गिराए गए ‘लिटिल बॉय’ नाम के परमाणु बम ने मिनटों में 1,40,000 लोगों की जान ले ली थी। इसके ठीक तीन दिन बाद 9 अगस्त को नागासाकी पर दूसरा बम गिराया गया, जिसमें 70,000 लोग मारे गए थे।
आज इस हमले के बचे हुए लोगों (Survivors) की संख्या घटकर महज 91,105 रह गई है और उनकी औसत उम्र 86 वर्ष से अधिक हो चुकी है। इन बुजुर्ग पीड़ितों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि आने वाली पीढ़ी कहीं इस महाविनाश के सबक को भूल न जाए।
भारत और दुनिया के लिए हिरोशिमा डे का महत्व
हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाएं पूरी दुनिया को यह याद दिलाती हैं कि युद्ध और परमाणु हथियारों का नतीजा केवल तबाही होता है। भारत हमेशा से ही ‘नो फर्स्ट यूज’ (No First Use) की नीति और शांतिपूर्ण कूटनीति का पक्षधर रहा है। आज के वैश्विक दौर में जहां रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व में तनाव चरम पर है, वहां हिरोशिमा दिवस का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।
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